🔥 क्या शूद्रो का शातिर दुश्मन मुसलमान है?🔥
आज मेरी उम्र 74वें साल में चल रही है। बचपन में याद है, एक देवकुर घर ( भगवान का घर) हुआ करता था। अनपढ़, गवार कोई भी पुरोहित, पंडित हर एकादशी , महीने में दो बार शाम को घर पर आता, पाव किलो देशी घी का हवन करता। कुछ घी ले भी जाता था। रूपये पैसे के अलावा दक्षिणा में चावल, आटा दाल भी देना पड़ता था, यही नहीं, वह दक्षिणा भी उसके घर तक हम लोगों को ही पहुंचाना पड़ता था।
सभी छोटे बड़ो को तिलक लगाता, सभी लोग उसके पैर छूते और वह सबको आशीर्वाद देता था। अर्थात सबको अपने से नींच बनाता था। बचपन में कहानी भी सुनते थे, "आन का आटा, आन का घी, भोग लगाएं पंडित जी, शाबास -शाबास बाबा जी "
भगवान् के नाम पर एक सामाजिक धार्मिक परम्परा बनायी गई थी, कहीं-कहीं और कुछ परिवारों में तो अभी भी चालू है। इस तरह से ढोंगी पाखंडी काम, जैसे बच्चे के जन्म के समय को मूर या अपशकुन बता देना, मंगली करार कर देना और फिर उसे पूजा-पाठ करके शुद्धि करण करते हुए पैसे ऐंठना एक साधारण बात होती थी। ऐसे ही धार्मिक पाखंड कभी बच्चे का नामकरण, कभी गृह प्रवेश, कभी समय खराब या ग्रहण लगा है, कभी उसकी शुद्धिकरण या सत्यनारायण कथा आदि रूपो में चलता रहता है। ब्राह्मणों ने हिन्दू धर्म में जीवन पर्यन्त अपने पेटपूजा या भरण पोषण के लिए एक और तरीका निकाला हुआ है, जिसका नाम है मां बाप का गुरू-मुख होना। इसके माध्यम से गुरु- मुख दम्पति की कमाई से 25% की हर साल हिस्सेदारी लेना और जब कभी गुरू-मुख किए हुए पंडित जी सामने दिखाई दिए तो, दंडवत प्रणाम करना अनिवार्य है , अन्यथा अनर्थ होने का डर, दिलो-दिमाग में भर दिया गया है। दूध-दही या कुछ दक्षिणा मांग दिया तो अपने बच्चे का हक्कानी मारकर उसको देना पहली प्राथमिकता होती है। हर इंसान के दिलो-दिमाग में कयी तरह के धार्मिक डर पैदा कर दिया गया था। हमें याद आ रहा है, आठवी कक्षा में (1966) हम लोगों (10 ) के साथ एक ब्राह्मण का लड़का भी पढ़ता था , वह कितना भी बदमाशी करता था, हमलोग उसे, इस डर से कि बरम लगेगा, कभी उसे गाली या मारते नहीं थे।
इसी तरह शादी -विवाह या मरने के बाद अन्तिम संस्कार में भी भाग्य -भगवान्, पाप -पुन्य का डर और लालच दिखा कर जन्म से लेकर मरने तक आर्थिक, मानसिक, सामाजिक शोषण करता रहता है।इस परम्परा द्वारा ब्राह्मण अपने जजमान शूद्रों को अपने से नींच बनाने का षणयंत्र रचा है। इस तरह शूद्रों को बौद्धिक रूप से कमजोर करना, उनके मनोबल को गिराना और उन्हें धार्मिक गुलाम बनाए रखना, एक तरह से मानवता को कलंकित करने वाला, विश्व का सबसे बड़ा अपराध लगता है ।
अफसोस हमलोग आज भी अज्ञानता और मूर्खता में अपने पुर्वजों के अपराधियों को ही मान सम्मान देते चले आ रहे हैं।
आज भी जब कभी मैं गांव जाता हूं तो, हमारे समकक्ष या छोटी उम्र का अनपढ़ गवार, ब्राह्मण, यहां तक कि ठाकुर भी, सामने होने पर, जिज्ञासा भर, वह यह उम्मीद करता है कि, मैं ही पहले उसे इज्जत देते हुए नमस्कार या पाय लागू बोलूं। इसी अनुभव को देखते हुए बार बार दिमाग में खटकता है कि, हम ब्राह्मण से नींच क्यों है और कब-तक बनें रहेंगे? यह भी सवाल उठता है कि, मेरे अंदर ही यह प्रश्न क्यों बार बार उठता है? आप लोगों में क्यों नहीं?, क्या आप बुजदिल हैं? आश्चर्य तब और होता है कि, मुझे सामाजिक व्यवहार और परिस्थितियों को देखकर तथा उसे महसूस कर स्वयं ज्ञान प्राप्त हुआ है, लेकिन आप को बताने पर भी महसूस क्यों नहीं हो रहा है? जबकि माननीय अखिलेश यादव जी को कयी मौकों पर अपमानित होने पर शूद्र होने का एहसास हो गया है। आप को खुद इसपर चिंतन मनन करने की जरूरत है।
एक उदाहरण देना उचित होगा।
तीन-चार साल पहले, मैं अपने गांव में एक सम्पन्न यादव परिवार के खुले द्वार पर 5-6 लोगों के साथ बैठा हुआ था। वहां पर एक 40-50 साल का ब्राह्मण भी बैठा हुआ था। वह पान खाते हुए, पिच पिच करते हुए, बड़ी शान से कुर्सी पर जहां बैठा था वहीं थुककर साफ सुथरी जगह पर गंदगी भी कर रहा था। उसका यह व्यवहार मुझे पसंद नहीं आ रहा था। कुछ उसकी उम्र से छोटे और बड़े भी वहां आते, कुछेक पाया लागी पंडित जी करते और कुछ एक लोग उसके पैर छूते थे। इसके बदले में वह सभी को आशिर्वाद देता था। मुझसे रहा नहीं गया, टोक ही दिया। पंडित जी आप अपने से बड़ों को आशीर्वाद देने के लायक है? लोगों की आस्था है, पैर छूते हैं इसलिए मैं आशिर्वाद देता हूं। मैंने कहा, आप ऐसा करने से मना क्यों नहीं करते हैं? जवाब था, मैं किसी को पैर छूने या पाय लागी बोलने के लिए थोड़े कहता हूं। मैंने कहा, मानवीय शिष्टाचार निभाते हुए, आप अपने से बड़ों को देखते ही पहले, पाय लागी, प्रणाम या नमस्कार क्यों नहीं कर देते हैं? कुछ मिनटों बाद ही उठकर चले गए। मैंने हिदायत भी दी कि ऐसे गन्दे लोगों को अपने द्वार पर क्यों बैठाते और मान-सम्मान देते हैं।
कुछ सामंती अहंकारी शूद्रों का इसे नकारते हुए यह कहना कि, आप की परवरिश के माहोल के कारण आप के साथ ऐसा होता हैं, हमारे बाप दादा के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ है, ब्राह्मण के बच्चे भी हमलोगों को नमस्कार या प्रणाम करते हैं। एक दो अपवाद हो सकते हैं, उसे मैं नकार नहीं रहा हूं। मेरे साथ भी छुआछूत, ऊंच-नीच जैसा व्यवहार कभी नहीं हुआ है, लेकिन अज्ञानता में बचपन में खुद करते हुए महसूस किया है। इस तरह का मानवीय अत्याचार खूब देखा और सुना भी है। मैं आज भी मुंबई में काफी संपन्न यादवों को "पांव लागी पंडित जी" संबोधन करते हुए देखता हूं। हमारे एक चिर- परिचित सम्मानित डाक्टर साहब को, जिनकी उम्र करीब 75 साल हैं, अपने ब्राह्मण परिचित रोगियों को पांव लागी पंडित जी संबोधन करते देखा है। इस व्यवहार पर उन्हें टोका भी है, उनका कहना है कि, यह शिष्टाचार बहुत पहले से चला आ रहा है।
हिन्दू धर्म का मुख्य तत्व ज्ञान भी यही है कि ब्राह्मण सिर्फ मान सम्मान पाने का अधिकारी है, दूसरों को देने का नही ।
हमारा बचपन से लेकर आज तक मुसलमानों से सरकारी नौकरी पेशा में या सामाजिक जीवन चर्या में, हमेशा साथ रहा है। मैं 1979 - 1998 तक मुस्लिम बहुल क्षेत्र जोगेश्वरी पश्चिम, यादव नगर में रहा हूं। यादव नगर का अध्यक्ष होने के कारण भी, मैं यह दावा कर सकता हूं कि, कभी किसी भी तरह से किसी को भी अकारण अपमानित नही किया है। उल्टे जब भी सामना हुआ है, हमें मान सम्मान और सहयोग ही दिया है और लिया भी है। कुछ असामाजिक तत्व तो हर समाज में होते है, इसे नकारा नही जा सकता है।
कुछ लोग तो कुछ कारणो से इतने अच्छे होते है कि हम सोच भी नही सकते, जैसे ब्याज या सूद न लेना, दूध में पानी न मिलाना, आपस में भाई चारे से रहना, असहाय और गरीबो की यथाशक्ति मदद करना। मेरा साधारण सा अनुभव भी कहता है कि, यदि मुसलमानो के साथ राजनीतिक दुर्भावना, काश्मीर मसला और पर्सनल बाद -विवाद को अनदेखी करके देखें तभी सही आंकलन होगा। झगड़ा या वाद-विवाद तो हर परिवार में, अपने दर-दयाद में और भाई भतीजे के साथ ही ज्यादा होते रहते हैं। यदि प्रमाण देखना है तो पुलिस थाने में दर्ज शिकायत या कोर्ट मुकदमा जाकर देख लीजिए। मुसलमानों को अपना दुश्मन समझने का भूत उतर जाएगा। यदि आप स्वस्थ मानसिकता से देखें तो कहीं कोसो दूर तक, धर्म आधारित हिन्दू-मुसलमान दुश्मनी का कारण नजर नही आता है। यही नहीं स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजी शासन में तथा सैकड़ों सालों तक मुगल मुसलमान पिरियड में भी , राजा रजवाड़ों के साम्राज्य विस्तार में धार्मिक हिंदू-मुस्लिम की नफरत भारत के इतिहास में कहीं नहीं दिखाई देती है।
एक अनुभव शेयर करना उचित समझता हं।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुम्बई में 1993 में बहुत बड़ा हिन्दू -मुस्लिम दंगा हो गया। मुस्लिम बहुल जोगेश्वरी पश्चिम यादव नगर के साथ साथ कुछ और हिन्दू बस्ती चारो तरफ से मुस्लिम बस्तीयों से घिरी हुई थी । यादव नगर के हनुमान मंदिर और मुस्लिम सगुफा बिल्डिंग के मस्जिद की दीवार कामन थी। बाहर से कुछ असामाजिक तत्व आते थे, गलत अफवाह फैलाकर दंगा कराने की कोशिश करते रहते थे।
किसी भी कीमत पर यादवों और मुसलमानों में दंगा कराना उनका मकसद रहता था। एक ब्राह्मण भी बाहर से अपनी पहचान छिपा कर आता था, जो तथाकथित हिन्दुओं का रक्षक होने का दावा भी करता था। उसको बराबर जबाब देकर मैं भगा देता था। उसका बार बार अफवाही मैसेज जैसे, वहां --- मुसलमानों ने हिन्दुओं को काट डाला, सगुफा बिल्डिंग और मस्जिद में आज रात को हथियारों का जखीरा रखा गया है। मैंने कहा, तुम यहां से दूर रहकर हथियारों का जखीरा देख लेते हो, जब कि हमलोग बाजू में रहकर रात-भर पहरेदारी करके भी नहीं देख पाए।
हिन्दू -मुस्लिम शान्ति एकता कमेटी भी बनाई गई थी। जोगेश्वरी रेल्वे स्टेशन, आने जाने के लिए करीब 500 मीटर मुस्लिम बस्ती से ही गुजरना पड़ता था। किसी हिन्दू को कोई नुकसान न हो, मुस्लिम भाई पूरे रास्ते की चौकसी करते हुए सुरक्षा की जिम्मेदारी लिए हुए थे । मैं भी कुछ लोगो के साथ यादव नगर के बाहर चौराहे पर ही हर समय चौकसी करता रहता था। एरिया में शान्ति बनी हुई थी।
एक बार पुलिस की गाड़ी आई, मैं खुद सामने आकर अधिकारी से बात किया और कहा साहब यहां सब नार्मल है, चिन्ता की कोई बात नहीं है। इतना कहते ही मुझ-पर डंडे चला दिया और कहा यह तुम्हारा काम नहीं है, अपने घर से बाहर मत निकलो।
उनके गलत इरादों को भांपते हुए भी अपना फर्ज निभाया और यादव नगर मे दंगा भड़काने के लाख कोशिशों के बाद भी, कहीं किसी को एक खरोच तक नहीं आने दिया।
ठीक है मान लिया स्वतंत्रता से पहले तुम्हारा मनु का संविधान था। तुमने शूद्रों को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक तथाकथित हिन्दू बनाकर शोषण किया। लेकिन आज समता, समानता और बंधुत्व पर आधारित संविधान होने के बावजूद भी, शूद्रों के मूलभूत सम्वैधानिक अधिकारो का हनन और विरोध भी तथाकथित हिन्दू ही करता है, जबकि मुसलमान सहयोगी और हमदर्द हर मौके पर दिखाई देता है ।
कुछ पाखंडी ब्राह्मण शूद्रों पर सदियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अत्याचार करते आ रहे हैं और इसे ही हिन्दू धर्म का गुणधर्म और परम्परा बताते आए हैं, इसलिए खुद सुधरने की कोशिश भी नहीं करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि इस अत्याचारी धार्मिक परम्परा पर पर्दा डालने के लिए मुसलमानों को बेवजह दुश्मन बताने की कोशिश करते आ रहे है।
अब आकलन आप को करना है, विशेष रूप से अंधभक्तों को कि, आप का शातिर दुश्मन कौन है?
आप का समान दर्द का हमदर्द साथी!
गूगल@ गर्व से कहो हम शूद्र हैं
गूगल@ शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
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🔥 هل المسلم هو العدوّ الماكر للشودر؟ 🔥
اليوم أبلغ من العمر الرابعة والسبعين. أتذكّر من طفولتي أنّه كان هناك في البيت ما يُسمّى «ديوكُر» (بيت الإله). كان يأتي أيّ كاهن أو براهمن، ولو كان أمّيًا وجاهلًا، كلّ يوم إكاداشي (مرتين في الشهر) مساءً إلى البيت، فيقيم طقس «الهَفَن» بربع كيلو من السمن البلدي. وكان يأخذ معه بعض السمن أيضًا. وإلى جانب المال، كان علينا أن نقدّم له «الدكشِنا» من أرزّ ودقيق وعدس، وليس هذا فحسب، بل كنّا نحن من نُوصل تلك العطايا إلى بيته.
كان يضع «التيلاك» على جباه الصغار والكبار، والجميع يلمسون قدميه، وهو يمنحهم البركة. أي أنّه كان يُشعر الجميع بأنهم أدنى منه. وكنّا نسمع في طفولتنا حكايات مثل: «دقيقُ الآخرين، وسمنُ الآخرين، نقدّم القربان أيّها الكاهن، أحسنتَ أحسنتَ يا بابا جي».
باسم الإله صُنعت تقاليد اجتماعية دينية، وما زالت مستمرّة في بعض الأماكن وبعض العائلات حتى اليوم. وكانت أعمال الدجل والخرافة شائعة، كاعتبار وقت ولادة الطفل «نحسًا» أو «شؤمًا»، أو وصفه بـ«مانغلي»، ثم ابتزاز المال بحجّة الطقوس والتطهير. وهكذا استمرّ الدجل الديني بأشكال مختلفة: تسمية المولود، دخول البيت الجديد، سوء الطالع، تأثير الكواكب، طقوس التطهير، أو حكاية «ساتيانارايان» وغيرها.
لقد ابتكر البراهمة في الديانة الهندوسية وسيلة أخرى للعيش على حساب الناس طوال حياتهم، تُسمّى «غورو-موخ» (اتخاذ الوالدين تابعين للغورو). وبموجبها يأخذ الغورو 25% من دخل الزوجين سنويًا، وإذا صادف ظهور الكاهن الذي جعلك «غورو-موخ»، يصبح السجود الكامل له واجبًا، وإلّا يُزرع في العقول الخوف من المصائب. وإذا طلب لبنًا أو زبدة أو صدقة، تُقدَّم له الأولوية حتى لو كان ذلك على حساب حقّ الأطفال. هكذا زُرعت في عقول الناس شتّى أنواع الخوف الديني.
أتذكّر في الصفّ الثامن (عام 1966) أنّ بيننا طالبًا ابن براهمن. كان يفعل الكثير من المشاغبات، ومع ذلك لم نكن نسبّه أو نضربه خوفًا من «اللعنة».
وبالمثل، في الزواج أو بعد الوفاة في طقوس الحرق، يستمرّ الاستغلال الاقتصادي والنفسي والاجتماعي من الميلاد حتى الموت، عبر تخويف الناس بالقدر والإله، وبالخطيئة والثواب. بهذه التقاليد دبّر البراهمة مؤامرة لجعل «الشودر» أدنى منهم. إضعاف الشودر فكريًا، وتحطيم معنوياتهم، وإبقاؤهم عبيدًا دينيين، يبدو لي جريمة كبرى تلطّخ إنسانية العالم.
للأسف، ما زلنا اليوم نُجِلّ ونحترم، عن جهل وسذاجة، المجرمين أنفسهم الذين ظلموا أسلافنا.
حتى اليوم، حين أزور قريتي، ألاحظ أنّ براهمنًا أمّيًا، بل وحتى ثاكورًا، سواء كان في مثل سني أو أصغر، ينتظر بدافع الفضول أن أكون أنا من يبدأ بتحيّته باحترام أو بلمس قدميه. ومن هذه التجارب يتردّد في ذهني مرارًا: لماذا نحن أدنى من البراهمن؟ وإلى متى سنبقى كذلك؟ ولماذا يلحّ هذا السؤال في داخلي وحدي؟ لماذا لا يطرحه الآخرون؟ هل أنتم جبناء؟ ويزداد عجبي حين أرى أنّني اكتسبت الوعي بنفسي من خلال ملاحظة السلوك الاجتماعي والظروف، لكن حين أُخبركم لا تشعرون به. بينما أدرك السيّد أخيليش ياداف في مناسبات عدّة، حين تعرّض للإهانة، معنى كونه شودرًا. أنتم بحاجة إلى التأمّل والتفكير بأنفسكم.
مثال على ذلك:
قبل ثلاث أو أربع سنوات، كنت جالسًا في قريتي عند باب مفتوح لأسرة يادافية ميسورة مع خمسة أو ستة أشخاص. وكان هناك براهمن في الأربعين أو الخمسين من عمره. كان يمضغ «البان» ويبصق بتفاخر من مكانه على الكرسي، ملوّثًا المكان النظيف. لم يعجبني سلوكه. كان يأتي أناس أصغر وأكبر سنًا، فيسجد بعضهم له أو يلمسون قدميه، وهو يمنحهم البركة. لم أتحمّل فسألته: «يا بانديت جي، هل أنت أهلٌ لمنح البركة لمن هم أكبر منك؟» قال: «الناس يؤمنون بذلك، يلمسون قدمي، فأمنحهم البركة». قلت له: «لماذا لا تمنعهم؟» قال: «أنا لا أطلب من أحد أن يلمس قدمي». قلت: «لماذا لا تبادر أنت، بدافع اللياقة الإنسانية، إلى تحية من هم أكبر منك بالسجود أو السلام؟» وبعد دقائق نهض وغادر. ونبّهت أهل البيت أيضًا: لماذا تسمحون لأشخاص قذرين كهؤلاء بالجلوس عند بابكم وتمنحونهم الاحترام؟
يردّ بعض الشودر الإقطاعيين المتغطرسين بإنكار ذلك قائلين: «هذا بسبب بيئة تربيتك، لم يحدث هذا مع آبائنا وأجدادنا، حتى أبناء البراهمة يحيّوننا». لا أنكر وجود استثناءات. ولم أتعرض شخصيًا للنبذ أو التمييز الطبقي، لكنني في طفولتي مارسته بجهل وشعرت به. رأيت وسمعت كثيرًا من هذا الظلم الإنساني. وما زلت أرى في مومباي يادافيين ميسورين يخاطبون الكهنة بعبارة «باون لاغي بانديت جي». ورأيت طبيبًا محترمًا في الخامسة والسبعين من عمره يخاطب مرضاه البراهمة بالعبارة نفسها. وحين عاتبته قال: «هذه لياقة قديمة».
جوهر المعرفة في الديانة الهندوسية، كما يُمارَس، هو أنّ البراهمن وحده مستحقّ الاحترام، لا منحه للآخرين.
منذ طفولتنا وحتى اليوم، عشنا مع المسلمين في الوظائف الحكومية وفي الحياة الاجتماعية. عشت بين 1979 و1998 في جوغيشواري الغربية، حيّ ياداف نغر ذي الغالبية المسلمة. وبوصفي رئيس الحي، أؤكد أنّني لم أُهِن أحدًا بلا سبب قطّ. بل على العكس، كان هناك دائمًا احترام وتعاون متبادل. يوجد عناصر سيئة في كل مجتمع، ولا يمكن إنكار ذلك.
هناك أناس طيّبون إلى حدّ لا نتصوّره: لا يأخذون الربا، لا يغشّون في اللبن، يعيشون بالأخوّة، ويساعدون الفقراء والمحتاجين قدر استطاعتهم. وتجربتي البسيطة تقول: لو نظرنا إلى المسلمين بعيدًا عن النوايا السياسية السيئة، وقضية كشمير، والنزاعات الشخصية، سنصل إلى تقييمٍ صحيح. الشجار موجود في كل أسرة، بين الأقارب والإخوة. ومن يريد الدليل فلينظر إلى شكاوى مراكز الشرطة أو قضايا المحاكم. سيتلاشى وهم اعتبار المسلمين أعداء. إذا نظرتم بعقلٍ سليم، فلن تجدوا سببًا دينيًا حقيقيًا لعداء هندوسي–مسلم. وحتى قبل الاستقلال، في الحكم البريطاني، وعلى مدى قرون في العهد المغولي، لا يظهر في تاريخ الهند عداء ديني هندوسي–مسلم مرتبط بتوسّع الممالك.
أشارك تجربة أخرى:
بعد هدم مسجد بابري، اندلعت في مومباي عام 1993 فتنة كبيرة بين الهندوس والمسلمين. كانت أحياء هندوسية محاطة بأحياء مسلمة، ومنها جوغيشواري الغربية – ياداف نغر. كان جدار معبد هانومان مشتركًا مع جدار مسجد بناية «سغوفا». كان بعض العناصر المشبوهة يأتون من الخارج لنشر الشائعات وإشعال الفتنة. كان هدفهم الدائم إشعال صراع بين اليادافيين والمسلمين. وكان يأتي براهمن متخفّيًا، يدّعي حماية «الهندوس»، وكنت أردّ عليه وأطرده. كان يشيع أخبارًا كاذبة: «المسلمون قتلوا الهندوس»، «هناك مخزن أسلحة في المسجد الليلة». فقلت له: «أنت تراها من بعيد، ونحن جيران نحرس الليل كلّه ولم نرَ شيئًا».
شُكّلت لجنة سلام ووحدة هندوسية–مسلمة. وكان الطريق إلى محطة جوغيشواري يمرّ 500 متر داخل حيّ مسلم. تكفّل الإخوة المسلمون بحراسة الطريق لحماية الهندوس. وكنت مع آخرين نرابط عند تقاطع خارج ياداف نغر. ساد الهدوء.
جاءت سيارة الشرطة، فتقدّمت وتحدّثت مع الضابط وقلت: «الأمور طبيعية ولا داعي للقلق». فضربني بالعصي وقال: «ليس هذا عملك، ابقَ في بيتك». ورغم إدراكنا لسوء نواياهم، أدّينا واجبنا، ولم نسمح بإصابة أحد ولو بخدش واحد رغم محاولات إشعال الفتنة.
حسنًا، لنفترض أنّ دستور «مانو» كان قبل الاستقلال، وأنّ الشودر تعرّضوا للاستغلال الاقتصادي والاجتماعي والثقافي والسياسي باسم الهندوسية. لكن اليوم، رغم وجود دستور قائم على المساواة والحرية والأخوّة، ما زال انتهاك الحقوق الدستورية الأساسية للشودر ومعارضتها يأتي من «الهندوس» المزعومين، بينما يظهر المسلمون داعمين ومتضامنين في كل مناسبة.
لقد مارس بعض البراهمة الدجّالين ظلمًا اجتماعيًا واقتصاديًا وسياسيًا على الشودر لقرون، وقدّموه بوصفه جوهر الدين والتقاليد، ولذلك لا يحاولون الإصلاح. وأرى أنّهم، لإخفاء هذا الإرث الظالم، يحاولون بلا سبب تصوير المسلمين كأعداء.
الآن، التقييم لكم، وخصوصًا للمغلقين العقول:
من هو عدوّكم الحقيقي الماكر؟
رفيقكم المتعاطف مع آلامكم المشتركة!
غوغل: قولوا بفخر نحن شودر
غوغل: شودر شيفشنكر سينغ ياداف
(لقراءة وفهم مئات المقالات المشابهة، ابحثوا في غوغل عن اسمنا ورسالتنا، ويمكنكم شراء كتبنا الأربعة: قولوا بفخر نحن شودر، الوعي الإنساني، الشودرية بديل البراهمنية، ولحظات لا تُنسى، عبر أمازون أو فليبكارت. شكرًا لكم!)

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